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रामधारी खंड 1 प्रतिलेखन संख्या 9-10 मंगल फॉन्ट (इंस्क्रिप्ट कीबोर्ड ) ()
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सभापति महोदय, ये शब्द मेरे नहीं है बल्कि राष्ट्रपिता के हैं। जो लोग आज सरकार में बैठे हुए हैं। क्या वे अपने दिल में सोचेंगे कि यह देशद्रोह शब्द बालकों को अंग्रेजी पढ़ाने के लिए राष्ट्रपिता का कहा हुआ है। आज 54 वर्ष देश को स्वतंत्र हुए हो गए हैं लेकिन राष्ट्रपिता की इस बात पर आज तक ध्यान नहीं दिया गया है। अंग्रेजी भाषा को पढ़ाना क्यों बंद नहीं किया गया और उसको दैनिक कार्यों में क्यों प्रयोग में लाया जाता है? मैं इस बात को कई बार इस सदन में कह चुका हूँ और मैंने इस विधान परिषद की नियमावली में एक वर्ष पहले एक संशोधन भी रखा था लेकिन मेरा दुर्भाग्य है कि वह संशोधन वर्ष भर से इस सदन में प्रस्तुत नहीं हो सका। मेरी अपनी राय है कि कम से कम दैनिक कार्यों के लिए यदि सरकार अंग्रेजी भाषा पर बंधन लगा दे तो बहुत अच्छा हो और जो यह अनुशासनहीनता है वह भी समाप्त हो जाए।सभापति महोदय, जैसा कि मेरे मित्र ने कहा, लड़कों के माता-पिता अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं और उनके शिक्षक भी उसका प्रयोग करते हैं फिर बालकों पर उसका प्रभाव क्यों नहीं पड़ेगा? मैं उनसे सहमत हूँ कि बालकों में नकल करने की आदत होती हैं। जैसा वे अपने बड़ों को करते देखते हैं वैसा ही वे करते हैं। अगर हम कोई बुरा काम करेंगे तो उसका प्रभाव बालकों पर अवश्य पड़ेगा। आप देखेंगे कि जिस मनोवृत्ति के माता-पिता और शिक्षक होते हैं उसी प्रकार के बालक भी होते हैं। हम दूसरों को तो परामर्श दे देते हैं लेकिन स्वयं उस पर अनुपालन नहीं करते। इसके साथ ही साथ हमको शिक्षा-प्रणाली की और भी ध्यान देना है। शिक्षा के जिन तरीकों को आजकल अपनाया जा रहा है वे वास्तव में लाभकारी नहीं हैं। सरकार की ओर से इस प्रकार का आदेश होना चाहिए कि चौदह वर्ष तक बालकों को अपनी मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाएगी और दैनिक कार्यों में भी अंग्रेजी का प्रयोग नहीं होगा। इस प्रस्ताव में अनेक महत्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान दिलाया गया है। मैं समझता हूँ कि जब माननीय मंत्री जी इस का उत्तर देंगे तो कह देंगे कि हम बहुत-सी बातों पर कार्यान्वयन कर रहे हैं। लेकिन मैं समझता हूँ कि उन पर कोई कार्यान्वयन नहीं हो रहा है।सभापति महोदय, आज हमारे देश में जो ऊपर से लेकर नीचे तक शिक्षा दी जा रही है उसमें व्यवस्था ही एक कारण है जिसकी वजह से शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। मेरा अपना विचार है कि जो शिक्षा प्रणाली है और जिस रूप में शिक्षा दी जा रही है, वही अनुशासनहीनता का भी कारण है। अपने देश और प्रदेश में हर एक की अपनी-अपनी भाषा है और वह बालक जो इस देश में पैदा हुआ है, जो अपनी मातृभाषा की गोद में पला है, उसको यदि अपनी मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाए तो मेरा विचार है कि शिक्षा का स्तर ठीक हो सकता है। जो सबसे बड़ी भूल और कमी सरकार के द्वारा दी जाने वाली शिक्षा के संबंध में हो रही है, वह यह है कि बालक की मातृभाषा में शिक्षा न देकर, उसकी उस भाषा में शिक्षा देने की व्यवस्था की गई है जो हमारे देश या प्रदेश की भाषा कभी रही ही नहीं। मेरा अभिप्राय विदेशी भाषा अंग्रेजी से है। मैं यह मानकर चलता हूँ कि जब से यह भाषा इस देश में आई है, चाहे वह किसी कारण से आई हो, इसे आप भी और इस माननीय सदन के सदस्य भी जानते हैं कि उस से बुरे परिणाम ही निकले हैं, कोई भलाई नहीं हुई है। इस देश को जो हानि हुई है वह किसी से छिपी नहीं है। हम देख रहे हैं कि हमारे यहाँ जितना फैशन बढ़ रहा है और जितनी वेशभूषा बिगड़ रही है वह सब अंग्रेजी भाषा के ही कारण है।जिस समय यहाँ पर अंग्रेजों का राज्य था, प्राय: यह देखने को मिलता था कि वे लोग जो विशेष कर के किसी न किसी तरह से सरकारी पक्ष के ही होते थे अंग्रेजों से मिलने के लिए जाते समय अंग्रेजी वेशभूषा का ही प्रयोग करते थे। परंतु यह इस प्रदेश और इस देश का दुर्भाग्य है कि अंग्रेजों का राज्य समाप्त हो जाने के बाद भी लोग उनकी वेशभूषा को पहनते चले जा रहे हैं। इससे जो प्रभाव हमारे देश के फैशन पर पड़ा उससे लाभ के बजाय हानि ही हुई है और हो भी रही है। मेरा ऐसा विचार है कि अंग्रेजी वेश-भूषा से इस देश को बहुत हानि हुई है। भारत की गौरवपूर्ण सभ्यता और संस्कृति के संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान देने की आवश्यकता है।
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